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भारतीय करेंसी नोटों पर महात्मा गांधी की फोटो नहीं छापी जाएगी, RBI ने क्या कहा?

By Admin@2001

Published on: December 17, 2025

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RBI

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देहरादून: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने भारतीय करेंसी नोटों से महात्मा गांधी की तस्वीर हटाने के बारे में फैली अफवाहों पर आधिकारिक तौर पर जवाब दिया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर हुई चर्चाओं से भारत के बैंकनोट डिज़ाइन में बड़े बदलावों की अफवाहें उड़ी थीं, जिसके बाद सेंट्रल बैंक को एक साफ़ बयान जारी करना पड़ा। यह सफ़ाई तब आई है जब बड़े पैमाने पर अफवाहों से भारतीय मौद्रिक प्रतीकों के भविष्य को लेकर नागरिकों के बीच भ्रम पैदा होने का खतरा था।

दशकों से, गांधी की तस्वीर भारतीय करेंसी डिज़ाइन का एक अहम हिस्सा रही है, जो 5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोटों पर दिखाई देती है। इसलिए, किसी भी सुझाए गए बदलाव ने स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान और चिंता खींची।

RBI ने करेंसी डिज़ाइन में बदलाव की अफवाहों पर रोक लगा दी है।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में सोशल मीडिया पर चल रही उन तमाम खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें भारतीय मुद्रा से महात्मा गांधी की तस्वीर हटाने या नोटों के डिज़ाइन में बड़े बदलाव की बात कही जा रही थी। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि बैंक नोटों के मौजूदा स्वरूप में बदलाव का कोई प्रस्ताव नहीं है और जनता को ऐसी भ्रामक अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। केंद्रीय बैंक ने जोर देकर कहा कि करेंसी से जुड़े किसी भी आधिकारिक बदलाव की जानकारी केवल उनके आधिकारिक संचार माध्यमों द्वारा ही साझा की जाती है। इस स्पष्टीकरण का मुख्य उद्देश्य नागरिकों के बीच पैदा हुए भ्रम को दूर करना और भारतीय मुद्रा की विश्वसनीयता व उसकी ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखना है।

अफवाह फैलने का कारण

मुद्रा के डिजाइन में बदलाव की अफवाहें फैलने का मुख्य कारण सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी जांच-परख के साझा किए गए भ्रामक संदेश और पोस्ट थे। डिजिटल युग में किसी भी संवेदनशील जानकारी का ‘वायरल’ होना बहुत आसान है, और इसी का फायदा उठाकर कुछ असत्यापित दावों ने जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। इसके अलावा, डिजिटल रुपया (e-Rupee) की शुरुआत और उसके डिजिटल स्वरूप (जिसमें कोई पारंपरिक चित्र नहीं होता) को लेकर हुई चर्चाओं को भी कुछ लोगों ने गलत तरीके से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। लोगों ने यह मान लिया कि भविष्य की सभी करेंसी वैसी ही होगी, जिससे भौतिक नोटों से गांधी जी की तस्वीर हटने की अटकलों को बल मिला। सटीक जानकारी की कमी और आधिकारिक पुष्टि से पहले ही खबरों को साझा करने की प्रवृत्ति ही इस अफवाह के तेजी से फैलने की मुख्य वजह बनी।

डिजिटल करेंसी में फोटो क्यों नहीं होती?

डिजिटल करेंसी (e-Rupee) में पारंपरिक फोटो या पोर्ट्रेट न होने का मुख्य कारण इसका तकनीकी स्वरूप और कार्यक्षमता है। भौतिक नोटों के विपरीत, डिजिटल रुपया कागज़ पर छपा हुआ नहीं होता, बल्कि यह एक एन्क्रिप्टेड डिजिटल टोकन के रूप में काम करता है जो ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित है। भौतिक नोटों में महात्मा गांधी की तस्वीर सुरक्षा और पहचान का एक माध्यम होती है, जबकि डिजिटल मुद्रा में सुरक्षा के लिए उन्नत क्रिप्टोग्राफी और डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग किया जाता है। चूंकि यह केवल मोबाइल वॉलेट या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में लेनदेन के लिए उपयोग होता है, इसलिए इसमें दृश्य चित्रों (Visual Images) की जगह अद्वितीय डिजिटल कोड होते हैं। आरबीआई (RBI) ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल रुपया एक आधुनिक वित्तीय उपकरण है, और इसका स्वरूप भौतिक बैंक नोटों से पूरी तरह अलग है, जो केवल इसकी उपयोगिता और डिजिटल सुरक्षा पर केंद्रित है।

गांधीजी की फोटो नोट पर कब छपी थी?

भारतीय मुद्रा पर महात्मा गांधी की तस्वीर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है और इसे पहली बार वर्ष 1969 में उनके जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर स्मारक के रूप में पेश किया गया था। हालांकि, हम आज जिस रूप में गांधी जी की तस्वीर देखते हैं, उसे आधिकारिक तौर पर 1996 में ‘महात्मा गांधी सीरीज’ के माध्यम से पूरी तरह से लागू किया गया था। इस प्रसिद्ध चित्र में गांधी जी को मुस्कुराते हुए दिखाया गया है, जो वास्तव में 1946 में कोलकाता (तब कलकत्ता) के वायसराय हाउस में ली गई एक असली तस्वीर का हिस्सा है। आरबीआई (RBI) ने मुद्रा की सुरक्षा बढ़ाने और राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए अशोक स्तंभ के स्थान पर गांधी जी के पोर्ट्रेट को मुख्य वॉटरमार्क और तस्वीर के रूप में अपनाया, जो आज भारतीय नोटों की प्रामाणिकता और अखंडता का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।

निष्कर्ष

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने महात्मा गांधी की तस्वीर को नोटों से हटाने की सभी अटकलों को पूरी तरह से विराम दे दिया है। केंद्रीय बैंक का यह स्पष्टीकरण न केवल सोशल मीडिया पर फैली भ्रामक अफवाहों को रोकता है, बल्कि भारतीय मुद्रा की उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को भी सुरक्षित रखता है जो दशकों से हमारे देश की शान रही है। नागरिकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि डिजिटल रुपया और भौतिक नोट दो अलग-अलग माध्यम हैं, और डिजिटल तकनीक के आने का अर्थ पारंपरिक प्रतीकों का अंत नहीं है। अंततः, यह पूरा घटनाक्रम हमें यह सीख देता है कि वित्तीय मामलों में किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले आधिकारिक स्रोतों से उसकी पुष्टि करना अनिवार्य है, ताकि देश की अर्थव्यवस्था और प्रतीकों के प्रति विश्वास बना रहे।

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