नई दिल्ली/मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा आवश्यकता से अधिक नोट नहीं छापने के पीछे एक गहरा आर्थिक सिद्धांत (economic principle) और सुरक्षा का एक मजबूत नियम छिपा हुआ है। देश को चलाने के लिए भले ही नोटों यानी तरलता (liquidity) की जरूरत होती है, लेकिन इसका अत्यधिक प्रवाह अर्थव्यवस्था (economy) के लिए ‘ज़हर’ साबित हो सकता है। यह पूरा मामला RBI की नोट छापने की प्रणाली और मुद्रास्फीति (Inflation) के खतरे से जुड़ा है।
RBI का नोट छापने का वर्तमान नियम: न्यूनतम कोष प्रणाली
RBI की यह जिम्मेदारी है कि वह देश की जरूरत के हिसाब से नोट छापे, लेकिन इसके लिए एक कठोर नियम का पालन करना पड़ता है। पहले नोट छापने के लिए आरक्षित कोष प्रणाली (Reserve Fund Policy) अपनाई जाती थी, लेकिन वर्तमान में RBI न्यूनतम कोष प्रणाली (Minimum Reserve System – MRS) का उपयोग करती है।
न्यूनतम कोष प्रणाली के तहत, RBI को हमेशा अपने पास न्यूनतम 200 करोड़ रुपये का कोष (Fund) रखना अनिवार्य है। RBI का मानना है कि डिजिटल लेनदेन (digital transactions) के इस दौर में इतना बड़ा कोष पर्याप्त है।
200 करोड़ का ब्रेकअप (Breakup):
इस 200 करोड़ रुपये के कोष को RBI दो हिस्सों में रखती है:
- भारतीय रुपया (Indian Rupee): 125 करोड़ रुपये के मूल्य का भारतीय रुपया (या सोना)।
- विदेशी मुद्रा (Foreign Currency): 75 करोड़ रुपये के मूल्य की विदेशी मुद्रा, जैसे डॉलर।
यह कोष एक इमरजेंसी फंड (Emergency Fund) की तरह काम करता है, ताकि अप्रत्याशित आर्थिक संकट (unexpected economic crisis) या डॉलर की अचानक कमी जैसी स्थितियों से निपटा जा सके।
ज्यादा नोट क्यों नहीं छापता RBI? महंगाई का डर
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब देश को चलाने के लिए पैसे की बहुत जरूरत है, तो RBI ज्यादा नोट क्यों नहीं छापती? इसका सीधा संबंध मुद्रास्फीति (Inflation) से है।
जब RBI बिना किसी वास्तविक उत्पादन या सेवा में वृद्धि के अत्यधिक नोट छापकर बाजार में उतार देती है, तो लोगों के पास अचानक से अधिक पैसा (तरलता) आ जाता है। इससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग (Demand) बढ़ जाती है, जबकि आपूर्ति (Supply) सीमित रहती है।
नतीजतन, चीजों के दाम तेज़ी से बढ़ जाते हैं। यानी नोट छापने से गरीबी खत्म होने के बजाय महंगाई (High Prices) बढ़ जाती है। जैसे, यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति को बिना जरूरत इंजेक्शन (इंजेक्शन) दे दिया जाए, तो वह उसके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है, उसी तरह बिना सोचे-समझे नोट छापना अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है।
‘हेलीकॉप्टर मनी’ और उसका खतरा
विशेषज्ञ बताते हैं कि कभी-कभी जब देश में लंबे समय तक मंदी (Recession) दिखती है, तो RBI नोट छाप सकती है। जब सरकार मंदी या किसी विकट स्थिति में नोट छापकर सीधे लोगों को ऋण (Loan) के रूप में देती है, तो इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘हेलीकॉप्टर मनी’ (Helicopter Money) कहा जाता है। इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ऐसा लगता है जैसे हेलीकॉप्टर से पैसा गिराया जा रहा है।
- उद्देश्य: बाजार में तरलता (Liquidity) बढ़ाकर माँग पैदा करना।
- खतरा: यह लोन मार्केट में तरलता बढ़ाता है, लेकिन जैसे ही अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटती है, यही अतिरिक्त तरलता आगे जाकर भीषण मुद्रास्फीति पैदा कर सकती है।
कोरोना (Corona) महामारी के दौरान भी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भारत सरकार को हेलीकॉप्टर मनी छापने का सुझाव दिया था। हालांकि, वित्त मंत्रालय और RBI ने इस कदम को सोच-समझकर टाला, क्योंकि उन्हें डर था कि जैसे ही कोरोना का संकट खत्म होता, देश की अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति की आग में झुलस सकती थी।
निष्कर्ष: नोट छापना एक इंजेक्शन (Injection) की तरह है, जिसे बहुत सोच-समझकर और सही समय पर देना चाहिए। यह तात्कालिक राहत दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक (long term) आर्थिक स्थिरता के लिए यह खतरनाक साबित हो सकता है।
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