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Premānand Mahārāj:2 किडनी फेल होने पर भी हैं जीवित!

By Admin@2001

Published on: November 22, 2025

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Premānand Mahārāj

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वृंदावन की पावन भूमि पर आज एक ऐसा आध्यात्मिक प्रकाश पुंज विद्यमान है, जिसकी दिव्यता और सादगी ने दुनिया भर के करोड़ों लोगों को मंत्रमुग्ध कर रखा है। यह कहानी है अनिरुद्ध पांडेय से प्रेमानंद महाराज बनने तक की उस अलौकिक यात्रा की, जो त्याग और अटूट भक्ति की मिसाल है। कानपुर के अखरी गाँव में 1969 में जन्मे महाराज जी ने मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में ही ईश्वर की खोज में सांसारिक सुखों का परित्याग कर दिया था। आज वे वृंदावन के उन दुर्लभ और परम पूज्य संतों में से हैं, जिनकी वाणी में वह तप है कि हिंदू हो या मुस्लिम, हर कोई उन्हें समान रूप से श्रद्धा देता है। यहाँ तक कि विराट कोहली जैसी वैश्विक हस्तियाँ भी मानसिक शांति और मार्गदर्शन के लिए उनके चरणों में शीश नवाने आती हैं।

13 साल की उम्र में निकले घर से

अनिरुद्ध कुमार पांडेय का वैराग्य मार्ग किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जहाँ भक्ति की जड़ें बचपन में ही गीता और पुराणों के अध्ययन से जम चुकी थीं। मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में “मेरे तो केवल भगवान हैं” के अटल सत्य को स्वीकार कर, वे नौवीं कक्षा के बाद एक भोर चुपचाप घर से निकल पड़े। उनके पास न धन था, न भोजन; साथ थी तो बस एक गीता, कुशा का आसन, पीतल का लोटा और एक चादर। उनकी तपस्या की पहली परीक्षा तब हुई जब 14 घंटे की भूख-प्यास के बाद एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा मिला दही उनके लिए भगवान शिव का साक्षात संकेत बन गया। जब उनके पिता उन्हें वापस लेने पहुँचे, तो बालक अनिरुद्ध की अडिग निष्ठा और यह शब्द कि “यह ज़िंदगी अब भगवान के नाम है”, ने पिता के क्रोध को अश्रुओं में बदल दिया। भावुक होकर पिता ने उन्हें यह ऐतिहासिक आशीर्वाद दिया—“जाओ बेटा, अगर तुम बंजर भूमि पर भी बैठोगे तो वहां फूलों की वर्षा होगी।”

साक्षात्कार कैसे हुआ?

काशी की पावन धरती पर अनिरुद्ध पांडेय की आध्यात्मिक यात्रा ने एक नया मोड़ लिया, जहाँ उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का संकल्प धारण किया और ‘आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी’ के रूप में अपनी तपस्या आरंभ की। बाद में पूर्ण संन्यास लेकर वे स्वामी आनंद आश्रम कहलाए और तुलसी घाट पर एक प्राचीन पीपल के वृक्ष को ही अपना बसेरा बनाया। उनकी दिनचर्या त्याग की पराकाष्ठा थी—जहाँ ज़मीन उनका बिछौना और खुला आसमान उनकी छत थी; वे रोज़ रात 2:00 बजे उठकर गंगा स्नान के पश्चात घंटों गहन ध्यान में लीन रहते थे। भिक्षा के लिए वे मात्र 10-15 मिनट ही प्रतीक्षा करते और कुछ न मिलने पर केवल गंगाजल पीकर पुनः साधना में जुट जाते। वर्षों की इस कठोर शिव उपासना का फल उन्हें एक मध्य रात्रि को मिला, जब उसी पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान महादेव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। महादेव के उस मौन सानिध्य ने उनके हृदय में प्रेम का ऐसा संचार किया कि उनके भीतर ‘वृंदावन’ जाने का बीज अंकुरित हो गया।

वृंदावन की यात्रा और प्रेमानंद नाम

महादेव के दर्शन के उपरांत, काशी में आयोजित एक रासलीला ने महाराज जी के जीवन की धारा को सदैव के लिए बदल दिया। एक माह तक लीला के दर्शन करने के बाद, जब कलाकार वापस जाने लगे, तो उनके हृदय में विरह का ऐसा ज्वार उठा कि उन्होंने लीला मंडली के संचालक से स्वयं को साथ ले जाने की विनती की। उस समय संचालक ने जो शब्द कहे—“बाबा तुम बस एक बार वृंदावन आ जाओ, बिहारी जी तुझे छोड़ेंगे नहीं”—वे महाराज जी के लिए ‘गुरु मंत्र’ बन गए। बाबा युगल किशोर जी की सहायता से वे अंततः कान्हा की नगरी पहुँचे, जहाँ आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी से उनकी पहचान प्रेमानंद गोविंद महाराज के रूप में हुई। यहीं से उनके जीवन का वह स्वर्णिम अध्याय शुरू हुआ, जिसमें वे राधा रानी के अनन्य उपासक बनकर दुनिया को भक्ति और प्रेम का मार्ग दिखाने लगे।

कैसे है जीवित?

प्रेमानंद महाराज का जीवन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए एक रहस्य और आध्यात्मिक जगत के लिए एक ज्वलंत उदाहरण है। पिछले लगभग 20 वर्षों से उनकी दोनों किडनियाँ पूरी तरह खराब (End-Stage Renal Failure) हो चुकी हैं, लेकिन वे आज भी न केवल जीवित हैं, बल्कि अत्यंत ऊर्जावान होकर प्रतिदिन हज़ारों लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। उनकी इस ‘जीवन यात्रा’ का आधार नियमित डायलिसिस है, जो उनके रक्त को शुद्ध करने का कार्य करता है। डॉक्टरों का मानना है कि उनकी सात्विक जीवनशैली, कठोर अनुशासन और मानसिक दृढ़ता ने उनके शरीर को इस लंबी और कष्टकारी प्रक्रिया को सहने के योग्य बनाया है। महाराज जी स्वयं इसे “श्री राधा रानी की कृपा” मानते हैं और कहते हैं कि जब मन भगवान में लगा हो, तो शरीर के कष्ट गौण हो जाते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ इस बात से हैरान रहते हैं कि इतनी गंभीर शारीरिक स्थिति के बावजूद वे बिना थके घंटों सत्संग कैसे कर लेते हैं।

उनके जीवित रहने के मुख्य स्तंभ:

  • नियमित डायलिसिस: चिकित्सा विज्ञान के नियमों का पालन करते हुए वे समय पर अपनी डायलिसिस प्रक्रिया पूरी करवाते हैं।
  • मानसिक शक्ति: उनकी साधना और ध्यान की गहराई उन्हें शारीरिक दर्द से ऊपर उठने में मदद करती है।
  • अनुशासित आहार: वे अत्यंत सीमित और सात्विक आहार लेते हैं, जो उनकी किडनी की स्थिति के अनुकूल है।
  • ईश्वरीय विश्वास: उनकी अटूट आस्था उनके भीतर एक ऐसा सकारात्मक ‘हार्मोनल’ संतुलन बनाए रखती है जो रोग से लड़ने की शक्ति देता है।

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