नई दिल्ली: हस्तमैथुन (Masturbation) एक ऐसा विषय है जिसे लेकर हमारे समाज में अक्सर झिझक और चुप्पी देखी जाती है, जबकि यह एक सामान्य और प्राकृतिक मानवीय क्रिया है जो स्त्री और पुरुष दोनों के जीवन का हिस्सा हो सकती है। आज के आधुनिक युग में, लगभग हर कोई किसी न किसी स्तर पर इस क्रिया से परिचित है, और विज्ञान के नजरिए से इसे शरीर की अन्य प्राकृतिक क्रियाओं की तरह ही देखा जाता है। हालांकि, किसी भी अन्य आदत की तरह इसके भी अपने शारीरिक और मानसिक लाभ हैं, लेकिन इसकी अति या गलत समझ कुछ गंभीर परिणाम भी दे सकती है। इस लेख का उद्देश्य हस्तमैथुन से जुड़े सामाजिक मिथकों के पर्दे को हटाकर इसे विज्ञान, चिकित्सा परामर्श और योग दर्शन के संतुलित दृष्टिकोण से समझना है, ताकि हम अपने स्वास्थ्य और ऊर्जा के बीच एक सही तालमेल बिठा सकें।
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हस्तमैथुन के वैज्ञानिक फायदे
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और डॉक्टरों के अनुसार, हस्तमैथुन एक प्राकृतिक शारीरिक क्रिया हो सकती है, जो यदि संयमित हो, तो शरीर और मन को कई लाभ पहुँचाती है। इसका सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर पड़ता है; चरमोत्कर्ष (Orgasm) के दौरान शरीर में एंडोर्फिन, डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन जैसे ‘फील-गुड’ न्यूरोकेमिकल्स का स्राव होता है, जो तनाव और चिंता को कम करने में जादुई भूमिका निभाते हैं। ये हार्मोन न केवल व्यक्ति के मूड को बेहतर कर अवसाद (Depression) से लड़ने में मदद करते हैं, बल्कि शरीर को एक ऐसी शांति प्रदान करते हैं जिससे अनिद्रा की समस्या दूर होती है और गहरी नींद आती है। इसके अलावा, यह क्रिया व्यक्ति को अपनी आत्म-जागरूकता (Self-Awareness) बढ़ाने और अपने शरीर की पसंद-नापसंद को समझने का अवसर देती है, जिससे भविष्य में यौन स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में बेहतर संतुष्टि और संचार स्थापित करने में मदद मिलती है।
वीर्य की महत्ता
योग और आयुर्वेद के प्राचीन दर्शन में वीर्य (शुक्र) को मात्र प्रजनन का एक माध्यम नहीं, बल्कि जीवन शक्ति का सबसे बहुमूल्य सार यानी ‘ओज’ (Ojas) का आधार माना गया है। आयुर्वेद के महान विद्वान आचार्य सुश्रुत के अनुसार, हमारे द्वारा ग्रहण किए गए भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म और लंबी है। शरीर में पाचन के बाद सबसे पहले ‘रस’ बनता है और फिर एक क्रमिक चक्र के माध्यम से रक्त, मांस, मेदा, अस्थि और मज्जा का निर्माण होता है; अंततः लगभग 30 दिन और 4 घंटे के कठिन शारीरिक परिश्रम के बाद ‘शुक्र धातु’ (Semen) तैयार होती है। यही कारण है कि योगियों और ऋषियों ने इसे शरीर की सबसे कीमती संपत्ति माना है। योग दर्शन के अनुसार, जब इस ऊर्जा को संरक्षित किया जाता है, तो यह ऊर्ध्वगामी होकर मस्तिष्क में ओजस और तेज के रूप में परिवर्तित हो जाती है, जो व्यक्ति को मानसिक स्पष्टता, अदम्य साहस और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है।
अनावश्यक स्खलन के गंभीर दुष्परिणाम
योग दर्शन और आयुर्वेद के अनुसार, शरीर की सबसे मूल्यवान ऊर्जा ‘शुक्र धातु’ का अनावश्यक और अत्यधिक क्षरण व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में बड़ी बाधा बन सकता है। जब कोई व्यक्ति, विशेषकर कम उम्र में, अपनी जीवन शक्ति का दुरुपयोग करता है, तो इसका सबसे पहला प्रभाव शारीरिक बनावट पर दिखता है—गाल पिचक जाते हैं, आँखें धँस जाती हैं और शरीर हमेशा थकान व कमजोरी की चपेट में रहता है। आयुर्वेद मानता है कि वीर्य के अत्यधिक नाश से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) और पाचन तंत्र अत्यंत कमजोर हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति बार-बार बीमारियों और अपच का शिकार होने लगता है। मानसिक स्तर पर, यह अभ्यास स्मृति (Memory) और एकाग्रता को नष्ट कर देता है, जिससे छात्र जीवन में असफलता और चिड़चिड़ापन घर कर जाता है। यही नहीं, ऊर्जा की कमी के कारण समय से पूर्व बुढ़ापा, बालों का झड़ना और कमर दर्द जैसी समस्याएँ भी घेर लेती हैं। सामाजिक और वैवाहिक दृष्टि से भी इसके परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं, जहाँ व्यक्ति आत्मविश्वास खो देता है, एकांत पसंद करने लगता है और उसका मन हमेशा नकारात्मक व वासनापूर्ण विचारों में उलझा रहता है।
कितनी बार करना सही है?
हस्तमैथुन की ‘सही’ आवृत्ति या संख्या को लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और प्राचीन योग दर्शन के बीच एक वैचारिक भिन्नता देखने को मिलती है। अधिकांश आधुनिक डॉक्टरों का मानना है कि यह एक व्यक्तिगत क्रिया है और तब तक स्वस्थ मानी जा सकती है जब तक कि यह आपके सामाजिक जीवन, काम या मानसिक स्वास्थ्य में बाधा न डाले। उनके अनुसार, शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रियाओं को दबाने के बजाय उन्हें संतुलित रखना महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, योग और ब्रह्मचर्य का मार्ग वीर्य संरक्षण पर अत्यधिक बल देता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से माना जाता है कि ऊर्जा का संचय उच्च बौद्धिक क्षमता और आत्म-साक्षात्कार के लिए अनिवार्य है, इसलिए इसे जितना संभव हो सके सीमित करने या पूरी तरह रोकने की सलाह दी जाती है। अंततः निष्कर्ष यह निकलता है कि यदि यह क्रिया आपको मानसिक रूप से कमजोर बना रही है, आपके भीतर ग्लानि या शर्म का भाव पैदा कर रही है, या आपको अपने जीवन के बड़े लक्ष्यों से भटका रही है, तो इसे ‘अति’ की श्रेणी में रखकर नियंत्रण पाने की आवश्यकता है।
हस्तमैथुन कैसे रोकें?
अत्यधिक हस्तमैथुन की आदत पर नियंत्रण पाने और ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलने के लिए जीवनशैली में अनुशासन और ऊर्जा का सही प्रबंधन अनिवार्य है। इसके लिए सबसे प्रभावी तरीका शारीरिक और मानसिक श्रम को बढ़ाना है, ताकि शरीर की अतिरिक्त ऊर्जा रचनात्मक कार्यों में खर्च हो सके। आयुर्वेद के अनुसार, हमारा भोजन हमारे विचारों को प्रभावित करता है, इसलिए सात्विक और हल्का आहार लेना चाहिए, क्योंकि अधिक मसालेदार या तामसिक भोजन कामुक उत्तेजना को बढ़ा सकता है। इसके साथ ही, ध्यान (Meditation) और प्राणायाम का नियमित अभ्यास मस्तिष्क के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ को मजबूत करता है, जिससे इच्छाओं पर नियंत्रण पाना आसान हो जाता है। अकेलेपन और वासनापूर्ण मीडिया से दूरी बनाकर तथा सकारात्मक संगत में रहकर हम अपने मानसिक वातावरण को शुद्ध रख सकते हैं। योग दर्शन के अनुसार, जब हम अपनी ऊर्जा को वासना से हटाकर किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति में लगाते हैं, तो इसे ‘ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन’ (Ascension of Energy) कहा जाता है, जिससे वही शारीरिक शक्ति ओजस और अद्वितीय बौद्धिक क्षमता में परिवर्तित हो जाती है।
निष्कर्ष
हस्तमैथुन की क्रिया अपने आप में न तो पूर्णतः सकारात्मक है और न ही नकारात्मक; इसका प्रभाव पूरी तरह से व्यक्ति के संयम (Moderation) और विवेक पर निर्भर करता है। आधुनिक विज्ञान जहाँ इसे मानसिक तनाव कम करने का एक जरिया मानता है, वहीं योग और आयुर्वेद की प्राचीन विद्या हमें सावधान करती है कि इस ऊर्जा का अत्यधिक व्यय हमारे शारीरिक और मानसिक तेज को नष्ट कर सकता है। जब यह क्रिया एक लत या बाध्यकारी व्यवहार का रूप ले लेती है, तो यह वीर्य जैसी बहुमूल्य जीवन शक्ति का क्षरण कर एकाग्रता, स्मृति और शारीरिक बल में कमी लाती है। जीवन को संतुलित और सुखी बनाने का वास्तविक मार्ग आत्म-अनुशासन, स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण और सात्विक आहार में निहित है। अपनी ऊर्जा को व्यर्थ बहने देने के बजाय उसे रचनात्मक कार्यों में लगाकर ही हम उस ‘ओजस’ को प्राप्त कर सकते हैं जो हमें सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाता है।
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