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न्याय के देवता ‘Golu Devta’: कुमाऊं के कण-कण में, जानें अनसुनी पौराणिक गाथा 2

By Admin@2001

Published on: January 11, 2026

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Golu Devta

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Golu Devta: उत्तराखंड की भूमि को देव भूमि यानी देवताओं की भूमि कहा जाता है, जहाँ माना जाता है कि देवता स्थायी रूप से निवास करते हैं जो अपने भीतर अनगिनत रहस्य और चमत्कार समेटे हुए है। यहां अनेक ऐसे चमत्कारिक धार्मिक स्थल हैं जहां कीख्याति देश में नहीं बल्कि विदेशों तक फैली हुई है।इसी पावन भूमि के कुमाऊं मंडल में एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें ‘न्याय का सर्वोच्च न्यायालय’ माना जाता है। हम बात कर रहे हैं न्यायकारी देवता गोलू महाराज(Golu Devta) की।

कुमाऊं में गोलू देवता(Golu Devta) को घर-घर में पूजा जाता है। भक्त उन्हें प्यार और श्रद्धा से गोलू राजा, बाला गौरिया, गौर भैरव और कृष्णावतारी जैसे नामों से पुकारते हैं। सफेद घोड़े पर सवार हाथ में धनुष-बाण लिए गोलू देवता त्वरित न्याय के लिए विश्वविख्यात हैं।

Golu Devta के जन्म की कथा

 ग्वालजू की जन्मभूमि ग्वालियरकोट चंपावत थी। इस ग्वालियरकोट में चंदवंशी राई खानदान का राज्य था। जिनमें हालराई, झालराई, तिलराई, गौरराई और कालराई आदि प्रमुख राजा हुए। ग्वालजू के पिताजी का नाम हालराई तथा दादाजी का नाम झालराई था। हालराई ने सात शादियां की लेकिन किसी से भी संतान पैदा नहीं हुई।आठवीं शादी उन्होंने पंचनाब देवों की बहन कलिंगा से की जिन्हें काली भी कहा जाताहै।

गलदेव जब कलिंगा के गर्भ में थे तो अन्य सात रानियां ईर्ष्या से भर उठी और उन्होंने सोचा कि यदि कलिंगा का पुत्र होगा तो राजा उसे अधिक प्रेम करने लगेंगे और उनकी उपेक्षा होने लगेगी। इससे बेहतर यह रहेगा कि वे किसी प्रकार कलिंगा के गर्भ के बालक का अंत कर दें।सातों रानियां राजा हालराई के पास गई और उन्होंने कहा कि बड़ी मुश्किल से आज हमें संतान का मुख देखने का सौभाग्य मिल रहाहै।

यदि हम बच्चा जनाने के लिए किसी दाई को बुलाएं तो पता नहीं वह क्या कर दे। यह हमारे कुल का कुल दीपक होगा। अतः हम सभी मिलकर बच्चा जनने में मदद करेंगे और किसी को भीतर जाने की अनुमति नहीं होगी। राजा उनकी बातों से सहमत हो गए। सातों रानियों ने कालिका से कहा कि हे बहन अगर तुम्हारा प्रसूति का समय आ गया है और तुम पहली बार मां बनने जा रही हो। तुम प्रसूति पीड़ा से मूर्छित ना हो जाओ इसलिए हम तुम्हारी आंखों में पट्टी बांध देते हैं। सात सौतों ने कलिंगा की आंखों में पट्टी बांध दी और सामने से फर्श को काटकर उसमें बड़ा छेद बना दिया।

सौतों के कई तरह के प्रयासों सेभी जब बालक गल गर्भ में नहीं मरा और पैदा हो गया तो उन्होंने फर्श के छेद से राजा गोरिया को बकरे गाय के गोट में डाल दिया। जहां हिली और चुली नाम के दो खतरनाक बकरे रहते थे। कालिका के सामने रक्त से सने दो सिलबट्टे रख दिए गए। आंख की पट्टी खोलकर उसे बताया गया कि तेरे गर्भ में यह पैदा हुए हैं। बकरे बकरियों और गाय के गोठ मेंभी जब बालक गोयल का बाल भी बांका नहीं हुआतो उन सौतों ने उन्हें एक पिंजरे में बंद करके काली गंगा नदी में डुबो दिया।

माता कलिंगा ने जब अपने सामने सिलबट्टे देखे तो वह रोने लगी कि हे भगवान सबके बच्चे पैदा होते हैं। मुझसे पत्थर पैदा क्यों हो गए? उन्होंने अन्न पानी भी सबका त्याग कर दिया। रात दिन रोते विलाप करते वह ईश्वर को पुकारती कि हे ईश्वर या तो मुझे मृत्यु दे दीजिए या पंख ताकि मैं आसमान में उड़ जाऊं या धरती फाड़ कर विवर बना दीजिए जिसे मैं पाताल में समा जाऊं या मेरे प्राणों को धागा बना दो जिसे तोड़कर मैं अपने प्राणों का अंत कर सकूं और किसी को अपना मुंह ना दिखा सकूं।

धीवरकोट में एक धीवर रहता था जो मछली मारने का काम करता था। काली गंगा में बहता हुआ बाल गोपाल गोयलजूका पिंजरा धीवर के जाल में उलझ गया। धीवर मछली पकड़ता था। धीवर ने जब पिंजरा खोला तो उसमें बालक गुल को देखकर खुशी से वह उछल पड़ा क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी। धीवर ने गुलजू का लालन पालन कर उसे बड़ा बनाया। इधर ग्वेल कभी-कभी अपनी माता को सपनों में दिखाई देने लगे थे। एक दिन काली गंगा के उस पार ग्वेलकाट के घोड़े पर सवार होकर आए।

वहां उन्होंने अपने घोड़े को पानी पिलाना शुरू किया। काली गंगा के इस पार से कालिका अपनी सातों सोतों के साथ नदी में नहाने के लिए आई हुई थी। काठ के घोड़े को पानी पिलाता हुआ देखकर उन रानियों ने गुल को ताना कसा कि कैसा पागल लड़का है काट का घोड़ा कभी पानी पीता है गुलजू ने प्रति उत्तर किया अगर रानी कलिंगा से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तोकाट का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता उसके बाद गुलजू ने अपनी मां कालिका को बताया कि मैं तेरा पुत्र हूं। कालिका ने उसे लाड प्यार करना शुरू किया।

जब राजा हालराई को अपनी सातों रानियों की काली करतूतों के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने सातों रानियों को कड़ी से कड़ी सजा दी। गुलजू ने अपनी माता कालिका को बताया कि हे मां तेरे सामने जो सिलबट्टेरखे थे वे लोड़ी सिली अवतार बन चुके हैं।मेरे जन्म के समय जितने भी रक्त के छींटे थे उन्होंने रगत कलु तगत कलु और भैरव कलुका अवतार ले लिया है।

न्याय के राजा की उपाधि(Golu Devta)

उनमें ही शूरवीपीर नोपका नारसिंह स्वप्ना भैरवों की उत्पत्ति हुई है। जिन्होंने तुम्हारी रक्षा की। गलजू ने अपनी माता से कहा कि वह नौ नवरात्रियों में ग्वालियर कोर्ट आकर उनसे मिलेंगे। तुम मुझे मेरा नैनि हाल बता दो। कालिका ने बताया कि मैं पंचना देवों की बहन हूं। इस प्रकार सभी देवता तुम्हारे मामा लगते हैं। नवरात्रियों में गुलजू नीलकंठ नेपाल गए। नवमी के दिन सब देवताओं का जागरण होता था। उस जागरण के दिन गुलजू ने अपने मामाओं से मुलाकात की और उनसे कहा कि मैं अकेला हूं।

मेरा आगे पीछे कोई नहीं है। आप मुझे रहने को जगह दो। कुछ वीर एवं शक्ति का वरदान दो। पंचनाम देवताओं ने उन्हें अपना आधा इलाका दे दिया और कहा कि तुम हमेशा आगे रहोगे। उन्होंने गुलजू की दोनों भुजाओं में 100-100 हाथियों का बल दे दिया। साथ ही मडघट मशान ढिणघट चोटी 1600 सूल मुंगिल पठान गाड़ी गढ़वान देकर ग्वल से पंचनाम देवों ने कहा घाड़ी लोल शैतान तूफान सब तुम्हारे आधीन रहेंगे और तुम मोटा वीर मर्दाना वीरों को लाकर गैल गर्ल चौड़ जाओ और वहां एक मंदिर बनाकर उसमें एक उच्च लिंग की स्थापना कर दो।

तुम वहां निर्भय होकर धुप धौड़ यानी कि घास के मैदान में घोड़े को धूप चराकर छेमनी चौड़यानी कि विशाल मैदान में घुड़सवारी करो। उस गल चौड़ में गलजू का एक छत्रराज हो गया। जो भी जन अन्न धन अत्याचार अनाचार एवं शोषण के कारण दुखी होते गुलजू उन सभी के दुखों को दूर करते थे और इसी के बाद सेही गुलजू का प्रचार प्रसार एक न्यायकारी राजा के रूप में समूचे कुमाऊं और उत्तराखंड में हो गया।

आपके प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: गोलू देवता कौन हैं और उन्हें किसका अवतार माना जाता है?

उत्तर: गोलू देवता उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित लोक देवता हैं। उन्हें भगवान शिव के ‘गौर भैरव’ अवतार के रूप में पूजा जाता है। उन्हें “न्याय का देवता” कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों को बहुत जल्द न्याय दिलाते हैं।

प्रश्न 2: गोलू देवता के प्रसिद्ध मंदिर कहाँ-कहाँ स्थित हैं?

उत्तर: कुमाऊं में गोलू देवता के तीन प्रमुख मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध हैं:

  1. चितई मंदिर (अल्मोड़ा): इसे न्याय का सबसे बड़ा दरबार माना जाता है।
  2. घोड़ाखाल मंदिर (नैनीताल): यह अपनी हजारों घंटियों के लिए विश्वविख्यात है।
  3. चंपावत मंदिर: इसे गोलू देवता का मूल जन्मस्थान और प्राचीन मंदिर माना जाता है।

प्रश्न 3: गोलू देवता के माता-पिता का क्या नाम था?

उत्तर: गोलू देवता (ग्वालजू) के पिता का नाम राजा हालराई था, जो चंपावत के चंदवंशीय राजा थे। उनकी माता का नाम कलिंगा (काली) था, जो पंचनाब देवों की बहन थीं।

प्रश्न 4: लोग गोलू देवता के मंदिर में घंटियाँ और चिट्ठियाँ क्यों चढ़ाते हैं?

उत्तर: ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति को कहीं से न्याय न मिले, तो वह अपनी समस्या एक कागज (अर्जी) पर लिखकर मंदिर में चढ़ा देता है। जब मनोकामना पूरी हो जाती है या न्याय मिल जाता है, तो भक्त आभार स्वरूप मंदिर में पीतल की घंटी चढ़ाते हैं।

प्रश्न 5: गोलू देवता की सवारी क्या है और वे किस रूप में दिखाई देते हैं?

उत्तर: गोलू देवता की सवारी श्वेत अश्व (सफेद घोड़ा) है। वे श्वेत वस्त्र धारण करते हैं और उनके हाथ में धनुष-बाण होता है, जो बुराई के विनाश और न्याय का प्रतीक है।

प्रश्न 6: गोलू देवता को किन-किन नामों से पुकारा जाता है?

उत्तर: उन्हें गोलू राजा, बाला गौरिया, ग्वेल देवता, गौर भैरव, दूदाधारी और कृष्णावतारी जैसे अनेक विशेषणों से विभूषित किया गया है।

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