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पश्चिम में सनातन का सूर्योदय, भारत में संस्कारों का ढलान: क्या हम अपनी पहचान खो रहे हैं?”

By Admin@2001

Published on: November 23, 2025

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सनातन, hinduism

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देहरादून: भारत की पावन धरती, विशेष रूप से वृंदावन और ऋषिकेश जैसे आध्यात्मिक केंद्र, आज एक असाधारण सांस्कृतिक विरोधाभास के साक्षी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर विश्व गुरु के रूप में भारत का आकर्षण वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा है और पश्चिमी देशों के लोग भौतिकवादी सुखों को पीछे छोड़कर सनातन धर्म की शांति, भारतीय वेशभूषा और भक्ति मार्ग में अपना जीवन समर्पित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत की अपनी नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कटती जा रही है। अपनी समृद्ध विरासत को ‘पिछड़ा’ समझने की भूल और पश्चिमी संस्कृति के विवादित व पतनशील पहलुओं का अंधानुकरण आज के युवाओं के बीच एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है। यह स्थिति न केवल हमारे सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रही है, बल्कि भारत के भविष्य के नैतिक और सांस्कृतिक आधार पर भी गहरे प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

विदेशी अपना रहे हैं सनातन

ऋषिकेश के शांत आश्रमों से लेकर वृंदावन की कुंज गलियों तक, आज एक गहरी सांस्कृतिक विडंबना साफ देखी जा सकती है। जहाँ विदेशी भक्त भारतीय वेशभूषा, तिलक और ‘हरे कृष्णा’ के जाप में मोक्ष और आत्म-ज्ञान तलाश रहे हैं, वहीं भारतीय युवा अपनी जड़ों से दूर भाग रहे हैं। विदेशी योगियों के लिए भारत की सादगी, संयम और अनुशासन जीवन का नया आधार बन गए हैं, और वे भारतीय पारिवारिक मूल्यों के प्रति अगाध सम्मान प्रकट कर रहे हैं। इसके ठीक उलट, भारत के शहरों में आधुनिकता के नाम पर एक ऐसा ‘पार्टी कल्चर’ हावी हो रहा है जहाँ अत्यधिक मद्यपान, नैतिक मूल्यों का ह्रास और गाली-गलौज को ‘ट्रेंडी’ माना जाने लगा है। यह देखना अत्यंत दुखद है कि जिस सनातन संस्कृति ने दुनिया को त्याग और प्रेम का पाठ पढ़ाया, विदेशी तो उसकी आध्यात्मिक शक्ति से मंत्रमुग्ध होकर उसे अपना रहे हैं, लेकिन उसी धरती की नई पीढ़ी उसे ‘रूढ़िवादी’ कहकर ठुकरा रही है।

भारतीय अपनी संस्कृति क्यों भूल रहे हैं

आज के दौर में भारतीय युवाओं के बीच विदेशी संस्कृति का बढ़ता प्रभाव एक गहरे सांस्कृतिक संक्रमण का संकेत दे रहा है। आधुनिकता की होड़ में नई पीढ़ी अपनी जड़ों को ‘पिछड़ा’ मानकर पश्चिमी जीवनशैली के उन पहलुओं को प्राथमिकता दे रही है, जिन्हें स्वयं पश्चिम के कई विचारकों ने पतनशील माना है। जहाँ भारतीय परंपराएँ संयम, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों पर टिकी हैं, वहीं अब ‘पार्टी कल्चर’, अत्यधिक मद्यपान, और रिश्तों में बढ़ती अस्थिरता (जैसे हुक-अप कल्चर) को एक ‘स्टेटस सिंबल’ की तरह देखा जा रहा है। विडंबना यह है कि जिस भारत ने दुनिया को योग और ध्यान का मार्ग दिखाया, उसी देश के युवा अब पश्चिमी देशों के सतही आकर्षण में फंसकर अपनी आत्मिक शांति और सांस्कृतिक पहचान खोते जा रहे हैं।

सनातन धर्म: 5000 वर्षों का ज्ञान भंडार

भारतीयों को आज यह गहराई से समझना होगा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पाठ की एक पद्धति नहीं, बल्कि 5000 वर्षों से चली आ रही एक वैज्ञानिक जीवन पद्धति (Scientific Way of Life) है। यह धर्म जीवन के हर पहलू—चाहे वह व्यक्तिगत व्यवहार हो, परिवार हो या पर्यावरण—के लिए एक सुदृढ़ नैतिक ढाँचा प्रदान करता है। संयमित जीवन, सात्विक भोजन और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित यह वह अनमोल ज्ञान है जिसे स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया में फैलाया था और जिसे आज पश्चिम के लोग मानसिक शांति के लिए अपना रहे हैं।

आज के युवाओं के लिए यह अनिवार्य है कि वे ‘आधुनिकीकरण’ (Modernization) और ‘पश्चिमीकरण’ (Westernization) के बीच के सूक्ष्म अंतर को पहचानें; असली प्रगति अपनी जड़ों को काटकर नहीं, बल्कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजते हुए आगे बढ़ने में है। यदि यह सांस्कृतिक विचलन इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहाँ भारत की समृद्ध विरासत के स्वामी विदेशी होंगे और भारतीय युवा अपनी ही पहचान से कटकर शहरों की भीड़ में दिशाहीन संघर्ष करेंगे। अतः समय की माँग है कि भारतीय युवा अपनी महान संस्कृति की ओर लौटें और अपने देश के मूल्यों को गर्व के साथ वैश्विक मंच पर स्थापित करें।

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