उत्तराखंड, जिसे ‘देवभूमि’ के नाम से जाना जाता है, वहाँ के सामाजिक ताने-बाने में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीबोगरीब और गंभीर संकट मंडरा रहा है – शादी का संकट। विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में माता-पिता के लिए अपने बेटों की शादी कराना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। सार्वजनिक बैठकों से लेकर बसों और चौपालों तक, हर जगह एक ही बात सुनने को मिल रही है कि “हमारे बेटे की शादी कैसे होगी?”
एक बढ़ती हुई सामाजिक समस्या
लेख में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे इस संकट को और गहरा करती हैं। ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं, जहाँ शादी तय हो जाने के बावजूद, लड़कियाँ ऐन मौके पर अपने माता-पिता के भरोसे को तोड़कर, किसी और के साथ भाग जाती हैं।
नैनीताल जिले के पहाड़पानी गाँव में हुई हालिया घटना इसका दर्दनाक उदाहरण है। जिस घर में शादी की खरीदारी चल रही थी, वहाँ से दुल्हन का अचानक गायब हो जाना न केवल एक परिवार की खुशियों को बर्बाद करता है, बल्कि उस लड़के और उसके परिवार को गहरे सदमे और अपमान में छोड़ देता है। यह प्रवृत्ति अब व्यक्तिगत घटना न होकर, एक सामाजिक पैटर्न (social pattern) बनती जा रही है।
क्या है इस समस्या की जड़?
आपकी चिंता जायज है कि लड़कियाँ अपने निजी संबंध और पसंद को माता-पिता से छिपाती हैं।
- गोपनीयता और धोखा: लड़कियाँ पहले से ही किसी लड़के को चुन लेती हैं, लेकिन परिवार को नहीं बतातीं। वे परिवार को किसी और से शादी तय करने देती हैं और जब दोनों परिवारों के बीच रिश्ते की नींव पड़ जाती है, तब अचानक भागकर न केवल अपने माता-पिता को, बल्कि दूसरे निर्दोष परिवार की भावनाओं और प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुँचाती हैं।
- संचार का अभाव: प्रेम विवाह (love marriage) के प्रति आपत्ति नहीं है, लेकिन सही समय पर, सही तरीके से, और पारदर्शिता (transparency) के साथ परिवार को जानकारी देना नैतिक रूप से अनिवार्य है। इस तरह का व्यवहार, जहाँ एक परिवार को भ्रम में रखकर उनके जीवन को बर्बाद किया जाता है, नैतिक मूल्यों के पतन को दर्शाता है।
बदलती प्राथमिकताएँ
विवाह संकट का एक और बड़ा कारण लड़कियों की बदलती प्राथमिकताएँ हैं, जो पलायन (migration) की समस्या से सीधे जुड़ी हुई हैं।
- गाँव की लड़कियाँ, शहर की चाहत: गाँवों की लड़कियाँ अक्सर गाँव के लड़के से शादी नहीं करना चाहतीं। उनकी पहली शर्त यह होती है कि उनका ससुराल शहर (city) या मैदानी क्षेत्रों में हो। वे पहाड़ की मुश्किल ज़िंदगी और मूलभूत सुविधाओं की कमी को पीछे छोड़ना चाहती हैं।
- शहर की लड़कियाँ, पहाड़ से दूरी: वहीं, शहरों में पली-बढ़ी लड़कियाँ तो पहाड़ के गाँवों में बसने की कल्पना भी नहीं करतीं।
यह असंतुलन एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है: अगर यह सिलसिला चलता रहा, तो पहाड़ के गाँव के बेटों से कौन शादी करेगा?
आपकी यह बात बिल्कुल सही है कि सुंदरता समय के साथ फीकी पड़ जाती है, लेकिन रिश्तों को समझने वाला, भावनात्मक रूप से मजबूत और भरोसेमंद जीवनसाथी ही एक सफल वैवाहिक जीवन (successful married life) का आधार होता है। जीवनसाथी का चुनाव करते समय लड़कियों को बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए, और परिवार को विश्वास में लेना चाहिए, चाहे वह व्यवस्थित विवाह (arranged marriage) हो या प्रेम विवाह (love marriage)।
संस्कृति पर प्रश्नचिह्न
एक तरफ जहाँ गाँवों के लड़के शादी के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शहरों में हो रही शादियों के परिणाम भी चिंताजनक हैं।
शहरों में विवाहित जोड़ों के बीच तलाक (divorce), अदालत में चल रहे मुकदमे (court cases), और घरेलू हिंसा (domestic violence) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। देवभूमि, जो अपनी संस्कृति, सरलता और पारिवारिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध थी, वहाँ रिश्तों की यह टूटन वाकई गंभीर चिंता का विषय है। यह दिखाता है कि सिर्फ स्थान बदलने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि आधुनिक जीवनशैली और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन न बना पाना रिश्तों को कमजोर कर रहा है।
माता-पिता और बेटियों की ज़िम्मेदारी
इस संकट से निपटने के लिए दोनों पक्षों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी:
- माता-पिता की भूमिका: माता-पिता को अपनी बेटियों की गतिविधियों पर केवल निगरानी (monitoring) ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके साथ खुला संवाद (open communication) स्थापित करना चाहिए। उन्हें यह विश्वास दिलाना चाहिए कि वे उनकी पसंद को समझेंगे और स्वीकार करेंगे, ताकि लड़कियाँ झूठ का सहारा न लें।
- बेटियों की नैतिक जिम्मेदारी: बेटियों को यह समझना चाहिए कि उनका एक फैसला दो परिवारों के भविष्य को प्रभावित करता है। यदि उन्होंने अपना जीवनसाथी चुन लिया है, तो उन्हें तुरंत अपने माता-पिता को सूचित करना चाहिए, न कि किसी और परिवार को धोखे में रखकर उनके जीवन को संकट में डालना।
उत्तराखंड के इस सामाजिक संकट का समाधान केवल कानूनी या पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि मजबूत पारिवारिक संवाद, नैतिक शिक्षा और बदलते मूल्यों के प्रति जागरूकता से ही संभव है। यह समय है कि देवभूमि के लोग अपनी जड़ों और रिश्तों के महत्व को फिर से पहचानें।
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