उत्तराखंड की पावन धरा, जिसे देवभूमि (Devbhumi) के रूप में पूजा जाता है, आज एक अत्यंत गंभीर और विरोधाभासी सामाजिक-आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है। देहरादून और हल्द्वानी जैसे शहरों के बढ़ते दबाव के बीच पर्वतीय क्षेत्रों में एक विचित्र ‘रिवर्स ट्रेंड’ (Reverse Trend) देखने को मिल रहा है। जहाँ एक ओर गाँवों के मूल निवासी संसाधनों के अभाव और बेहतर भविष्य की तलाश में अपनी पुश्तैनी ज़मीनें औने-पौने दामों पर बेचकर शहरों की ओर पलायन (Migration) कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बाहरी राज्यों का समृद्ध और रसूखदार वर्ग शांत वादियों की चाह में इन्हीं गाँवों में ऊँची कीमतें चुकाकर बस रहा है। यह स्थिति न केवल उत्तराखंड के ग्रामीण परिवेश को बदल रही है, बल्कि यहाँ की पारंपरिक संस्कृति और जनसांख्यिकी के अस्तित्व के लिए भी एक बड़ा खतरा बनकर उभरी है।
ज़मीन बेचकर शहर का सपना
उत्तराखंड के पर्वतीय गाँवों के निवासी आज बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोज़गार की तलाश में एक गहरे मनोवैज्ञानिक और आर्थिक द्वंद्व से गुजर रहे हैं, जिसके कारण वे अपनी पुश्तैनी ज़मीनें (Ancestral Lands) बेचने को मजबूर हैं। इन ज़मीनों के बदले मिलने वाली लाखों की रकम उन्हें मैदानी शहरों में एक समृद्ध जीवन शुरू करने का एक ‘अस्थायी भ्रम’ (Temporary Illusion) देती है, जिसे ‘अर्बन ल्योर’ या शहरी आकर्षण कहा जा सकता है। ज़मीन बेचकर ये परिवार देहरादून या हल्द्वानी जैसे शहरों में छोटे फ्लैट तो खरीद लेते हैं, लेकिन जल्द ही उन्हें वहाँ के भयंकर प्रदूषण, जीवन-यापन की भारी लागत और सीमित अवसरों जैसी कड़वी सच्चाई का अहसास होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि गाँव की वह सहज और न्यूनतम खर्च वाली आत्मनिर्भर ज़िंदगी, शहर के तनावपूर्ण और अत्यधिक महँगे माहौल के सामने बिखर जाती है, जिससे अंततः ये परिवार अपनी जड़ों और आर्थिक स्थिरता, दोनों से हाथ धो बैठते हैं।
ज़मीन बेचने और पलायन के पीछे के मुख्य कारण:
- संसाधनों का अभाव: गाँवों में गुणवत्तापूर्ण स्कूलों और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की कमी।
- अस्थायी आर्थिक सुरक्षा: ज़मीन बेचकर मिली एकमुश्त राशि को शहर में बसने का एकमात्र रास्ता मान लेना।
- शहरीकरण का दबाव: मैदानी शहरों की चकाचौंध और ‘सुविधाजनक जीवन’ का सामाजिक दबाव।
- खेती की चुनौतियाँ: जंगली जानवरों का आतंक और सिंचाई सुविधाओं की कमी के कारण खेती का अलाभकारी होना।
क्या ज़मीन बेचना समझदारी है?
विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है कि पहाड़ों में ज़मीन केवल एक अचल संपत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा (Social Security) और आर्थिक स्थिरता का अंतिम आधार है, जिसे बेचना एक ऐसा अपरिवर्तनीय निर्णय (Irreversible Decision) है जिसका पछतावा आने वाली पीढ़ियों को झेलना पड़ सकता है। उत्तराखंड के गाँवों में जीवन-यापन की लागत शहरों के मुकाबले काफी कम है और यहाँ की जलवायु खेती, पशुपालन व होमस्टे जैसे पर्यटन (Tourism) व्यवसायों के लिए अत्यंत अनुकूल है। यदि स्थानीय लोग पलायन के बजाय अपने गाँवों में ही आय के स्रोत विकसित करने पर ध्यान दें, तो वे अपनी आत्मनिर्भरता बनाए रख सकते हैं। यदि ज़मीन बेचने का यह वर्तमान सिलसिला नहीं थमा, तो भविष्य की तस्वीर डरावनी होगी—जहाँ पहाड़ के मूल निवासी शहरों की भीड़भाड़ में मामूली नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे होंगे, जबकि उनकी पुश्तैनी ज़मीनों और संसाधनों पर बाहर से आए समृद्ध वर्ग का कब्ज़ा होगा। अतः समय आ गया है कि उत्तराखंड का समाज अपनी मिट्टी की कीमत केवल रुपयों में नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, पर्यावरण और भविष्य की स्वायत्तता के रूप में आँके और अपनी जड़ों को मजबूती से थामे रखे।
क्या होगा अगर ज़मीन बिकती रही?
यदि ज़मीन बेचने का यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में इसके परिणाम अत्यंत विनाशकारी और अपरिवर्तनीय होंगे। सबसे बड़ा संकट सांस्कृतिक विस्थापन (Cultural Displacement) का होगा, जहाँ पहाड़ों और गाँवों के मूल निवासी अपनी ही जड़ों से कटकर शहरों की झुग्गियों या तंग बस्तियों में एक ‘अनामक’ जीवन जीने को मजबूर होंगे। भविष्य में, गाँवों की उपजाऊ और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ज़मीनों पर केवल समृद्ध बाहरी वर्ग का नियंत्रण होगा, जिससे स्थानीय लोग अपने ही पूर्वजों की धरती पर केवल मज़दूर या ‘किराएदार’ बनकर रह जाएंगे। इसके अलावा, पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Imbalance) भी बिगड़ेगा, क्योंकि व्यावसायिक हितों के लिए आने वाले लोग पहाड़ों के संवेदनशील पर्यावरण की कीमत पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर देंगे। अंततः, यह न केवल एक भौगोलिक परिवर्तन होगा, बल्कि एक पूरी सभ्यता, भाषा और विरासत का अंत होगा, जहाँ गाँव के ‘सच्चे वारिस’ शहरों की भीड़ में अपनी पहचान और स्वाभिमान तलाशते हुए संघर्ष कर रहे होंगे।
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